Saturday, 31 March 2018

ऐसी महिलाएं, देश की राजनीति में जिनका योगदान नहीं भुलाया जा सकता...


सशक्त महिलाऐंः- भारतीय राजनीति के योगदायी स्तम्भ
भारतीय राजनीति में ज्यों-ज्यों राजनैतिक मूल्यों के बिखराव की स्थिति आयी है त्यों-त्यों भारतीय राजनीति के सशक्तीकरण हेतु विभिन्न भारतीय नारियों ने राष्ट्रीय और प्रादेशिक स्तर पर राजनीतिक मील के पत्थरों को गाड़ने का कार्य किया है| यह स्पष्ट दर्शनीय है कि भारतीय स्वतंत्रता के आगाज़ के समय इंग्लैण्ड में अपने अंग्रेजी भाषण की अभिव्यक्ति से अंग्रेजों को मंत्रमुग्ध करने वाली  "सरोजनी नायडू" (दा नाइटिंगेल आफ इंडिया) सत्याग्रह आंदोलन से लेकर दक्षिण अफ्रीका तक भारतीय राजनीति की धाक जमाने वाली महिला राजनैतिक महिलाओं के नीव की एक इकाई हैं| "भारत कोकिला" ने उत्तर प्रदेश के राज्यपाल के पद को भी सुशोभित किया|

भारतीय राजनीति की द्वितीय महिला चेहरा "सुचेता कृपलानी" को भी भुलाया नहीं जा सकता| १९४६ में संविधान सभा की सदस्य रहकर इन्होंने भी राजनैतिक हस्ताक्षर दर्ज किए और उत्तर प्रदेश राज्य की प्रथम महिला मुख्यमंत्री बनीं|

"ग्रैंड ओल्ड लेडी" खिताब से नवाजित भारतरत्न "अरूणा आसिफ अली" का नाम भारतीय महिला राजनीतिज्ञों से न जोडा़ जाए तो बेमानी होगा| इन्होंने भारतीय स्वधीनता की राजनीति से लेकर मजदूर राजनीति तक अपनी स्मृति को उकेरा है|

इसी क्रम में स्वतंत्र भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री "श्रीमती इंदिरा गाँधी" ने अपने राजनैतिक कौशल की छाप पूरी दुनिया में छोडी़ है, चाहे वह १९७२ का द्विपक्षीय शिमला समझौता की मुस्तैद्दगिरी हो या विज्ञान के क्षेत्र में उन्नति का कार्य| इन्होनें बैंको का राष्ट्रीयकरण करके बैंको के लाभ को देश के विकास-कार्यों में लगाने का प्रयास किया| १९८२ में इन्होनें "एशियाड ८२" के खेलों का  केन्द्र भारत को ही बनाकर भारत का अन्य देशों से गौरवपूर्ण संपर्क स्थापित किया| इस प्रकार कह सकते है कि इंदिरा जी राजनीतिक क्रूरता के लिए बेमिशाल महिला थी| "ब्लू-स्टार" जैसे आॅपरेशन इनके नाम से जाने जाते हैं|

 यहीं "विजय लक्ष्मी पंडित" ने भी राजनीति में अपने हाथ आजमाए उन्होनें आपातकाल का जमकर विरोध किया, बुआ-भतीजी राजनैतिक प्रतिद्वदिता की मिशाल कही जा सकती हैं| इनके राजनैतिक चरित्र-चित्रण के अध्ययन से इन्हें "वुमेन पावर प्रोमोशनल मैग्नेट" की संज्ञा भी दे सकते हैं|

भारतीय राजनीति में दलित राजनीति की महिला राजनीतिज्ञ "सुश्री मायावती प्रभुदास" भी क्रमबद्ध है| ये उत्तर-प्रदेश की ५ बार मुख्यमंत्री रहीं हैं| इनकी रचनात्मक महत्वकांक्षा आख्यांकित करते हुए "स्टोन डिजाइन र्पोटर" कहा जाना चाहिए|

भारत की सियासत में एक नाम "महबूबा मुफ्ती" का भी है, महबूबा जम्मू-कश्मीर की "पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी" की अध्यक्ष हैं|

 इसी क्रम में "प्रतिभा देवी सिंह पाटिल" भारत की पूर्व राष्ट्रपति है, ये जुलाई २००७ में भारत की पहली महिला राष्ट्रपति बनीं और साबित किया कि महिलाऐं नीति निर्णायक मुद्दों में भी आगे हैं|

दक्षिण भारत की राजनीति में "जयललिता जयराम" एक सशक्त राजनैतिक महिला चेहरा रहीं|

 वहीं पूर्वी भारत में "ममता बनर्जी" तृणमूल कांग्रेस की मुख्यमंत्री हैं|

वहीं "वसुन्धरा राजे सिंधिया" मारवाड़ की धरती की राजनीति की एक जनप्रिय राजनैतिक महिला हैं|

इसके इतर "सुषमा स्वराज" वर्तमान में भारत की विदेश मंत्री हैं और भारत का विदेश स्तर पर प्रबलता से पक्ष रखने में सफल रहती हैं| ये सभी महिलाऐं राजनेता पुरूषों के अपेक्षा अपने-अपने दायित्वों के निर्वाहन में सफल प्रतीत होती हैं| जो भारत देश एवं भारतीय राजनीति के लिए गर्व की बात है|

घरेलू कामगार को सरकार से कानून की दरकार


किसी भी क्षेत्र में सम्बन्धित कार्य विषयक की प्रकृति के अनुपात में जब विषमता होती है तभी अधिकारों व कर्त्तव्यों पर चर्चा तथा न्याय-अन्याय की समीक्षा होने लगती है| प्रादेशिक व राष्ट्रीय स्तर पर आधुनिक भारत के शुरुआती दौर से ही समाज का एक तपका अदृश्य रुप में 'मेक इन इण्डिया' के कार्य में सहायक रहा है, वह है 'घरेलू कामगार' जो 'डोमेस्टिक पेट' की भाँति 'डोमेस्टिक वर्क' की तलाश में विचरते है और ठहराव की दशा में "वर्क ओरियन्टर" की दृष्टि व सोंच के अनुसार प्यार, विश्ववदारता अथवा शोषण पर निर्वाहन करने हेतु मजबूर हैं| एक भी उदाहरण देखने में मुझे नही मिला कि बचपन का घरेलू नौकर बुढा़पे में अलम-बरदार हुआ हो| कहीं-कहीं तो देश काल की दशा एवं दिशा के अनुरुप यह "पैरेन्टल" तक हो गया है| बस यहीं से एक अदृश्य तपके की समाज में सम्मानजनक मौजूदगी दर्ज कराने का अहसास और उसके कर्त्तव्यों, अधिकारों, सुरक्षा, अधिकारों की माँग की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, उस कानून और उस सशक्त पटल की स्थापना जहाँ उनके शोषण को विधि सम्मत न माना जाए विषय पर बहस तथा आवश्यकता महसूस की गई|
भारत की आजादी के एक से डेढ़ दशक पहले की जनगणना के अनुसार लगभग प्रशीर्  ० कामगार चिन्हित किए गए| वर्तमान भारत देश में बढी़ जनसंख्या के दृष्टिगत ६-७ दशकों में १२०-१२५ प्रतिशत घरेलू कामगारों की अप्रत्याशित वृद्धि हुई| "तमाम काम पर कम दाम तथा तमाम शोषण पर मात्र उदर-पोषण" नियोक्ताओं का अलिखित अधिकार हो गया| बावजूद इसके अनुमान है कि देश में घरेलू कामगारों की संख्या लगभग १ करोड़ से अधिक हो गई है|


किसी स्वतंत्र व विकासशील देश एवं उसकी आधुनिक अर्थव्यवस्था में इतनी बडी़ असंगठित आबादी को नजरअंदाज किया जाना ही अपने आप में उसके साथ अन्याय प्रतीत होता है| इनका शोषण एवं उसके विरोध में उठने वाले स्वर एकाकी एवं असंगठित होने के कारण उनकी अभिव्यक्ति इकाई रूप मे होती है इसलिए यथास्थान विरोध का दमन हो जाता है| जबकि बिखरे हुए कामगारों की स्थिति पर संवेदनशीलता व संगणित रूप से दृष्टिपात किया जाए तो यह किसी भी स्वतंत्र गणतंत्र के लिए एक त्रासदी का पर्याय कहा जाएगा| नोयडा और उसके जैसी तमाम घटित होने वाली घटनाऐं हमारे समक्ष घरेलू कामगारों की समस्याओं के प्रति संवेदनहीन प्रशासन द्वारा प्रकट की गई WHAT HAPPEN WHY? जैसे बडे़ अमिट प्रश्नचिह्नों के साथ प्रकट की गई त्रासदी का उदाहरण है|
इनके अधिकारों, सुरक्षा रोजगार की गारंटी, न्यूनतम मजदूरी पारिश्रमिक का नियमित भुगतान, दैनन्दिक कार्य अवधि का निर्धारण, आदि का नियमन किया जाना नितान्त आवश्यक है| घरेलू कामगारों के हितों-रक्षा के लिए नियमन कार्य को प्राथमिकता प्रदान करते हुए इनके लिए "घरेलू कामगार अधिकार अधिनियम" बनाना चाहिए ताकि 'मेक इन इण्डिया' की दिशा में एक मील का पत्थर गाडा़ जा सके और लगे कि इस देश का छोटे से छोटा कामगार संरक्षित और सुरक्षित है|

इतने बडे़ असंगणित क्षेत्र के लिए अभी तक कोई स्थायी विधेयक सृजित नहीं हो सका है| प्रसन्नता का विषय है कि केन्द्र सरकार के पास "घरेलू कामगार कल्याण विधेयक २०१६"  का मसौदा तैयार है| राष्ट्र एवं उक्त कामगारों के हित में सरकार यथाशीघ्र सदन में चर्चा कर घरेलू कामगार अधिकार अधिनियम के नियमन की कार्यवाही पूर्ण करें| इसके साथ ही शीघ्रातिशीघ्र घरेलू कामगार कल्याण आयोग की स्थापना की जानी चाहिए, जिसमें समसामयिक सुधारों की आवश्यकता होने पर सरकार को तद्नुसार सुधारात्मक संस्तुति प्रकोष्ठ ज्ञापित कर सके| जो विकसित होने की दिशा-दशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम होगा|