Sunday, 22 April 2018

किसान-बन्धु "अन्नदाता का दर्द"


त्याग और तपस्या का दूसरा नाम किसान है/ वह जीवनभर मिट्टी से सोना उत्पन्न करने की तपस्या करता है/ तपती धूप, कडा़के की ठण्ड तथा मूसलाधार बारिश भी उसकी इस साधना को तोड नहीं पाते/ एक कहावत है, कि भारत की आत्मा किसान है जो गाँवों में निवास करतें है/ किसान की कृषि ही शाक्ति है, और यह ही उसकी भक्ति है/
वर्तमान संदर्भ में हमारे देश में किसान आधुनीक विष्णु है/ वह देशभर को अन्न, फल, सब्जी-साग आदि दे रहा है, लेकिन बदले में उसे उसका पारिश्रमिक भी नही मिल पा रहा है/ प्राचीन काल से अबतक किसान का जीवन अभावों में ही गुजर रहा है/ अभी-भी उसके पास बरसों पुराने खेती के साधन है/ उसका सबकुछ मानसून पर निर्भर है/ अगर समय पर अच्छी बरसात नहीं होती है, तो उसके खेत सूखे पडे़ रहते है/ कर्मभूमि में काम करने के दौरान किसान चिलचिलाती धूप के दौरान तनिक विचलित नही होता/ किसान के जीवन में विश्राम की कोई जगह नही हैं/ वह निरन्तर अपने कार्य में लगा रहता है, कैसी भी बाधा हो उसे अपने कर्त्तव्यों से डिगा(हिला) नही सकती/ अभाव का जीवन व्यतीत करने के बाद भी  वह संतोषी प्रवृत्ति का होता है/

कभी-कभी उसके मलिन मुख पर भी ताजगी दिखाई देने लगती है/ जमींनदारों के शोषण से तो उसे मुक्ति मिली है/ परन्तु आज भी वह पूर्ण रूप से सुखी नहीं है/ आज भी २० से २५ प्रतिशत किसान ऐसे है जिनके पास दो-वक्त का भोजन तक नही हैं/ शरीर ढ़कने के लिए कपडे़ नही है, टूटे मकान व टपकती झोपड़ियाँ है/ ऋणग्रस्तता ने उन्हें गरीबी के मुहँ में ढ़केल दिया है/ जमीदारों व सरकार के कर्ज के बोझ तले दबकर उसका जीवन कभी अकाल तो कभी महामारी तो कभी बाढ़ व सूखे की चपेट में आ जाता है/ ऐसी स्थिति में उसे असमय ही मृत्यु वरण करने को विवश होना पड़ता है/ कई बार तो उन्हें सपरिवार सामूहिक रूप में भीषण गरीबी से जूझते हुए आत्महत्या भी करनी पड़ जाती है/ 

कर्ज के बोझ तले दबा उसका जीवन किसी बन्धुआ मजदूर के जीवन से कम नही है, सच कहा जाए तो वह कर्ज में पैदा होता है/ और कर्ज में ही मर जाता है/
भारतीय कृषक  का जीवन करूणा का महासागर है/ स्वयं अन्न उपजाने के बाद भी उसे तथा उसके परिवार को भरपेट खाने को अन्न नही मिलता/ किसान के लिए कृषि एक जुआ है, प्रकृति पर निर्भरता उसके जीवन की जटिल-समस्या है/

" जब बात ऐसे शक्स की हो जो खुद को गला के दूसरों का पेट भरने में, १२महीनें खेतों में जद्दो-जह्द करता नजर आए, वह है, हमारा 'किसान' / 
अगर हम आज इनके दर्द को नही समझेंगे तो शायद आने वाले कल मे, हमें खेतों मे, 'किसान नजर नही  आयेगें " 


https://youtu.be/n54o1MP7Nuo

Sunday, 1 April 2018

देश के युवा वर्ग के लिए प्रेरक लेख



युवावस्था जीवन की ऐसी अवस्था है, जहाँ हमे सीखने और जानने को मिलता है |इस अवस्था मे हम अपने आस पास हो रहे और खुद में हो रहे परिवर्तन को जानने अथवा महसूस करने लगते हैं | हमें सही और गलत मे अंतर पता लगने लगता है|यह ही सही समय है देश के प्रति अपने दायित्व की पूर्ति का / आज देश में युवाओं की भागीदारी को लेकर बेहस छिड़ी हुई है, हर तरफ़ यही सवाल है कि आखिर हम युवाओं को किस तरह विकास की राह में अपना सारथी बना पायेंगे | इस प्रश्न का एक उत्तर यह भी है कि युवा अपना आदर्श ऐसे व्यक्ति को बनाए जो वाकई जमीनी स्तर पर युवाओ के लिये आदर्श हो|ऐसे ही एक अहम् व्यक्ति हैं स्वामी विवेकानन्द |

किसी भी देश की युवा शक्ति उस देश की बुनियाद होती है| इस बात को वैदिक धर्म के विद्वान स्वामी विवेकानन्द भली भॉति समझते थे | स्वामी जी के अनुसार युवा समाज के कर्णधार होते हैं और वही उसके भावी निर्माता हैं| उनका कहना था कि युवा शक्ति वह स्वरूप है जो नव सृजन के लिये हर जगह उभर्नी चाहिये | भारत  की युवा पीढ़ी को स्वामी जी द्वारा प्रदान किये गए ज्ञान, प्रेरणा और तेज श्रोत से लाभ उठाना चाहिये|स्वामी जी का धार्मिक और सामाजिक दृष्टिकोण तर्कवादी तथा प्रगतिशील  था युवाओं को भी उनसे प्रेरणा पाकर उनके द्वारा बताए गए मार्ग पर चलने की आवश्यकता है|भारतीय  जन विशेष कर युवाओ के लिये उनका नारा था, "उठो जागो और लक्ष्य प्राप्त होने तक मत रुको|"
जब जब मानवता निराश और हताश होगी तब तब स्वामी  विवेकानन्द जी के उत्साही, ओज़स्वी और अनंत ऊर्जा से भरपूर विचार जन जन को प्रेरणा देते रहेंगे और हमे सफ़लता के मार्ग पर अग्रसर बनाए रखेंगे|

समाज को शिक्षा की आवश्यकता


'सुदूर' अतीत काल से ही यह स्वीकार किया गया है, कि शिक्षा में वह दिव्य गुण है, जो मानव की पाशविक प्रवृत्तियों का विनाश कर इसे प्रकाश की ओर ले जाती है/ शिक्षा समाज का अनिवार्य पोषक तत्त्व है, जो प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से समाज की बुद्धि को पोषण प्रदान करती है/

मानव जाति सृष्टि की श्रेष्ठतम कृति मानी जाती है/ श्रेष्ठ जाति में जन्म लेने पर भी मानव जन्म से है/ श्रेष्ठ सुसंस्कृत और सभ्य बनाती है/ शिक्षा के अभाव में वह पशु के समान रहता है, क्योंकि आहार, निद्रा, भय और संतानोत्पत्ति ये चार कृत्य तो पशुओं और मनुष्यों में समान रहते है/ शिक्षा ही एक ऐसा विशेष साधन है, जो मनुष्य का पाशविक प्रवृत्ति को नष्ट करके उसे सभ्य, सुसंस्कृत और श्रेष्ठ बनाती है/ शिक्षा शारीरिक और मानसिक दो रूपों में पायी जाती है/ इसके दोनों ही रूप एक सिक्के के दो पहलू है/ जो अनिवार्य है, साहित्य, संगीत व कला इन तीनों रूपों में मानसिक इच्छा व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करती है/

सामाजिक जीवन में मनुष्य के लिए चार पुरूषार्थ अति आवश्यक है वे हैं, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष/ इस संदर्भ में भी हम देखते है कि शिक्षा की ही महत्वपूर्ण भूमिका है/ क्योंकि बिना शिक्षा के न हम धर्म ही कर सकते हैं, न अर्थोपार्जन/ फिर काम और मोक्ष अति दुर्लभ हैं/ इन्हें प्राप्त करना तो लोहे के चने चबाना है/ यह ध्रुव सत्य है, कि यदि शिक्षा का उचित और सम्यक् सहयोग मानव को मिलें तो अनायास ही मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है/
समाज को शिक्षा की वैसे ही आवश्यकता है जैसे कि अंधकार में प्रकाश की और भूख मे भोजन की|

मन के हारे हार है मन के जीते जीत...



"यह जीवन क्या है? निर्झर है, मस्ती ही इसका पानी है|
सुख दुख के दोनो तीरों से, चल रहा राह मनमानी है| "
अनुशासित कर्मशीलता ही मानव जीवन है|संघर्षो से घिरा हुआ है जिस प्रकार किसी सरिता मे बहता जल कंकड़ पत्थर रुपी  व्यवधानों को पार कर बालारूण के प्रकार सुशोभित हो निरंतर अपना रास्ता तय करता रहता है, उसी प्रकार मानव भी अपने जीवन रूपी मार्ग मे अनेकों व्यवधानों को पार कर कष्टों को सहकर आगे बढ़ता है और मार्ग मेें अग्रसर रहता है |
प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन मे सफ़लता तथा असफ़लता का सामना करना पड़ता है यह मानव जीवन का महत्वपूर्ण अंग है| असफ़लता असल में यह ही सिद्ध करती है कि कार्य को मन लगाकर नहीं किया गया है/ यदि किसी भी कार्य को पूरे मन व समर्पण भाव से किया जाए तो मनुष्य निश्चित रूप से किए गए कार्य में सफल होगा/
हमारा मन ही हमारे बंधन और मोह का कारण है, मन पर विजय और मन की पराजय यह दो तथ्य ही मुख्य कारण है/ किसी भी कार्य में केवल मन लगाना ही पर्याप्त नहीं है/
आवश्यक यह भी है कि कार्य को करने में परिश्रम व कार्य पूर्ण करने का दृढ़ संकल्प भी मन में हो, हमारे अन्दर आत्मविश्वास तथा कार्यनिष्ठा होनी चाहिए/

कवि रहीम ने भी कहा है-
"रहीमन मनाहिं लगाइके, देखि लेहुँ किन कोय/
नर को बस कर तो, कहाँ नरायण वश होय//"
बहुत लोग कहते है मेरा इस कार्य को करने में मन नहीं लग रहा/ परन्तु यह समझना अनिवार्य है, कि यह केवल अकर्मण्यता मात्र है/ परिश्रम न करने या कार्य के प्रति समर्पित न होने व उससे बचने के लिए यह बहाना मात्र है-
आज के युग में लेंस मात्र भी चूक व अकर्मण्यता हमें सफलता के सोपान से नीचे खिसका देती है/ यदि हमारा मन नियन्त्रित है, तो हमारा शरीर स्वयं ही मन के नियन्त्रण में होगा तथा छोटी या बड़ी बाधा हम आसानी से पार कर सकेंगे/
कोई कार्य मुश्किल नही होताा जो एक मनुष्य कर सकता है वह प्रत्येक मनुष्य के लिए संभव है/ मन को बस सकारात्मक पोषण की आवश्यकता होती है, जिसकी भूख चरणबद्ध तरीके से बढ़ाते हुए पूर्ण पोषण करते रहना चाहिए/