'सुदूर' अतीत काल से ही यह स्वीकार किया गया है, कि शिक्षा में वह दिव्य गुण है, जो मानव की पाशविक प्रवृत्तियों का विनाश कर इसे प्रकाश की ओर ले जाती है/ शिक्षा समाज का अनिवार्य पोषक तत्त्व है, जो प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से समाज की बुद्धि को पोषण प्रदान करती है/
मानव जाति सृष्टि की श्रेष्ठतम कृति मानी जाती है/ श्रेष्ठ जाति में जन्म लेने पर भी मानव जन्म से है/ श्रेष्ठ सुसंस्कृत और सभ्य बनाती है/ शिक्षा के अभाव में वह पशु के समान रहता है, क्योंकि आहार, निद्रा, भय और संतानोत्पत्ति ये चार कृत्य तो पशुओं और मनुष्यों में समान रहते है/ शिक्षा ही एक ऐसा विशेष साधन है, जो मनुष्य का पाशविक प्रवृत्ति को नष्ट करके उसे सभ्य, सुसंस्कृत और श्रेष्ठ बनाती है/ शिक्षा शारीरिक और मानसिक दो रूपों में पायी जाती है/ इसके दोनों ही रूप एक सिक्के के दो पहलू है/ जो अनिवार्य है, साहित्य, संगीत व कला इन तीनों रूपों में मानसिक इच्छा व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करती है/
सामाजिक जीवन में मनुष्य के लिए चार पुरूषार्थ अति आवश्यक है वे हैं, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष/ इस संदर्भ में भी हम देखते है कि शिक्षा की ही महत्वपूर्ण भूमिका है/ क्योंकि बिना शिक्षा के न हम धर्म ही कर सकते हैं, न अर्थोपार्जन/ फिर काम और मोक्ष अति दुर्लभ हैं/ इन्हें प्राप्त करना तो लोहे के चने चबाना है/ यह ध्रुव सत्य है, कि यदि शिक्षा का उचित और सम्यक् सहयोग मानव को मिलें तो अनायास ही मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है/
समाज को शिक्षा की वैसे ही आवश्यकता है जैसे कि अंधकार में प्रकाश की और भूख मे भोजन की|




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