"यह जीवन क्या है? निर्झर है, मस्ती ही इसका पानी है|
सुख दुख के दोनो तीरों से, चल रहा राह मनमानी है| "
अनुशासित कर्मशीलता ही मानव जीवन है|संघर्षो से घिरा हुआ है जिस प्रकार किसी सरिता मे बहता जल कंकड़ पत्थर रुपी व्यवधानों को पार कर बालारूण के प्रकार सुशोभित हो निरंतर अपना रास्ता तय करता रहता है, उसी प्रकार मानव भी अपने जीवन रूपी मार्ग मे अनेकों व्यवधानों को पार कर कष्टों को सहकर आगे बढ़ता है और मार्ग मेें अग्रसर रहता है |
प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन मे सफ़लता तथा असफ़लता का सामना करना पड़ता है यह मानव जीवन का महत्वपूर्ण अंग है| असफ़लता असल में यह ही सिद्ध करती है कि कार्य को मन लगाकर नहीं किया गया है/ यदि किसी भी कार्य को पूरे मन व समर्पण भाव से किया जाए तो मनुष्य निश्चित रूप से किए गए कार्य में सफल होगा/
हमारा मन ही हमारे बंधन और मोह का कारण है, मन पर विजय और मन की पराजय यह दो तथ्य ही मुख्य कारण है/ किसी भी कार्य में केवल मन लगाना ही पर्याप्त नहीं है/
आवश्यक यह भी है कि कार्य को करने में परिश्रम व कार्य पूर्ण करने का दृढ़ संकल्प भी मन में हो, हमारे अन्दर आत्मविश्वास तथा कार्यनिष्ठा होनी चाहिए/
कवि रहीम ने भी कहा है-
"रहीमन मनाहिं लगाइके, देखि लेहुँ किन कोय/
नर को बस कर तो, कहाँ नरायण वश होय//"
बहुत लोग कहते है मेरा इस कार्य को करने में मन नहीं लग रहा/ परन्तु यह समझना अनिवार्य है, कि यह केवल अकर्मण्यता मात्र है/ परिश्रम न करने या कार्य के प्रति समर्पित न होने व उससे बचने के लिए यह बहाना मात्र है-
आज के युग में लेंस मात्र भी चूक व अकर्मण्यता हमें सफलता के सोपान से नीचे खिसका देती है/ यदि हमारा मन नियन्त्रित है, तो हमारा शरीर स्वयं ही मन के नियन्त्रण में होगा तथा छोटी या बड़ी बाधा हम आसानी से पार कर सकेंगे/
कोई कार्य मुश्किल नही होताा जो एक मनुष्य कर सकता है वह प्रत्येक मनुष्य के लिए संभव है/ मन को बस सकारात्मक पोषण की आवश्यकता होती है, जिसकी भूख चरणबद्ध तरीके से बढ़ाते हुए पूर्ण पोषण करते रहना चाहिए/



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